‘बाबा’ शब्द कै धर्म ‘ की जैदाद नीं च, बल या हमरि साझि संस्कृति की पछ्याण च
कोटद्वारम शोएब अहमद नौं कु एक दाना मनखि न ‘बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर’ नौं पर एक कपड़ों की दुकान ख्वलि च। बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटरा नौं से चलिण यीं दुकनि मा बजरंग दल का कुछ लोगुन पौंछिन अर दुकान कु ‘बाबा’ किलै च यांकु विरोध कायी। अर दाना (बुजुर्ग) दुकानदार तैं दुकनि कु नौं ‘बाबा’ हटौंणा खुणि बोलि।
बजरंग दल की यीं बातिकु विरोध कोटद्वारा की हि एक नौंना जैकु नौं दीपक छायीं न विरोध कायी अर बोलिकि दुकान कु नौं नी हट्ये जालु।
दुकानदार दगड़ि खडु ह्वेकैकि दीपक यु रैबार द्यायी की धर्म से पैलि मनख्यात च। यीं कारण च कि यु मामला अब सिरफ एक दुकान कु नौं तक नीं रे ग्यायी। बल या बात समाजै सोच, सहिष्णुता अर लोकतांत्रिक मूल्यौं कु सवाल बि बढ़ि ग्यायी। कोटद्वारै मा ह्वीं यीं घटनन सर्या देसम एक नै बहस छेड़ि द्यायी।
यख सबसे बडु सवाल यों च कि क्य ‘बाबा’ शब्द फर एक धर्म, एक जाति कु अधिकार च?
बाबा शब्द कु मूल फारसी तुकी अर अरबी च। इन्न त यु शब्द बौत पुरणु च अर अलग-अगल संस्कृतिम एक हि अर्थ से मिलदु। बाबा दाना लोगु तैं ब्वले जांद। हां हिन्दु अर मुस्लिम सूफी परंपरामा ऐ शब्द कु अलग-अलग अर धार्मिक अर सांस्कृतिक मतलब च।
हमर देसम बाबा बौत पैलि बिटि ब्वलें जांद। बाबा कखि बुबा खणि, कखि बुड्यां आदिम कु सम्मान मा त कखि संत लोगु खुणि ब्वलें जांद। फारसी, तुर्की, कुर्दी बाबा बुबा अर दाना लोगु खुणि, अरबी मा सम्मान, अफगानिस्तान, ईरान मा बुड्याैंं खुणि त तुर्की म बुबा अर धर्म गुरू खुणि, भारत, नेपालम साुध, संत बुड्यां अर कखि बुबा खुणि, बांग्लादेश म बुबा अर संतु खुणि सम्मान से ब्वलें जांद।
साफ च कि ‘बाबा’ त एक समान कु शब्द च, जै फर कै बि धर्मा कु अधिकार नीं च, बल यु हमर सांस्कृतिक अर समाजै पछ्याण से जुड़युं च। यु शब्द पिरेम, श्रद्धा अर अपड़य्या (अपनत्व) कु शब्द च।
बाबा कैबि धर्म, संप्रदाय की जैदाद नीं च। अब अगर हम कै नौं अर निसाणु तैं बि धर्मा बीच ल्याणा कोसिस करला, त समाजम तैं द्वी भागु मा बटणा कोसिस तैं तागत मिललि। भारत देसा पछ्याण विविधता मा एकता च, जख शब्द परंपरा अर संस्कृत सबि एक दुसरा दगड़ि जुड़ी च।
कै दुकानदारै धर्मा नौं अर पछ्याण पर वैंकी दुकनि कु नौं से खार खाणु असंवैधानिक ही नीं च, बल यु समाज मा जहर बि घवळु च। यीं घटनम दीपक कु काम बौत अच्छु च। वैन बतै दे कि सच्चु धर्म नफरत ना बल मनख्यात (मानवता) सिखान्द। समाज मा जब कुछ लोगु नफरतै आग पिल्चाणां छायीं तब दीपकै हिकमत यु बतौंन्द की आज बि लोगुम साऽस (साहस) ज्यूंद च।
या घटना हमतैं या बात स्वचणा खुणि मजबूर करदि कि क्य हम धर्मा रक्षा करणा छौ, या फिर धर्मा नौं पर समाज मा जहर घोळणा कु काम करणा छा। धर्म ज्वड़णा कु काम करदु, ना कि त्वड़ण कु। समाज मा छ्वटि-म्वटि छ्वीं तैं हम धर्म कु चश्मा लगैकि दख्यला त समाजम तणातणि (तनाव) त पैदा होलि हि।
अब या बात बि समझणै दरकार च की कै हौरि धर्म का लोगु जब अपणि दुकान कु नौं बाबा रखदन त, वुंकी मकसद बाबा कु नौं या फिर कै धर्म तैं ध्वका देंणु कु कतै नीं हूंदू, बल वु त इन्न बाबा कु आसीस लिंणा वास्ता इन्नु करदन। समाज मा आस्था धर्मा की केरा (सीमा) भितर नीं रैंदि, बल वा त सम्मान अर विस्वास कु प्रतीक हूंद। इल्लै बाबा नौं की दुकान पिछल तीस सालु बिटि चलणि च। स्वच्चा अगर ‘बाबा’ कु आसीस यीं दुकनि पर नीं हूंद त या दुकान तीस साल न बल तीस दिन मा बन्द ह्वे जान्दि।
आज हमतैं धर्म से पैलि मानवता तैं समझिकि सहिष्णुता तैं अपणि तागत बणौंणे दरकार च।
हां बाबा कै धर्म जैदाद नीं च, बल यु हमरि साझि संस्कृति की पछ्याण च, अर दीपक जन्ना ज्वान कु हिकमत बतौंन्द कि भारत देसा असली तागत कै खास धर्म से खार (नफरत) कैकि ना, बल भै-भयात (भाईचारा) मा च।
