निरबुद्धि विधायक कु घमंड

उत्तराखण्ड तैं देवभूमि हि ना बल वीरभूमि भि ब्वलें जांद, अर यीं वीरभूमि का ताज छन ‘वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली’।

23 अप्रैल 1930 खुणि पेशावर का किस्साखानी बजार मा अंग्रेजु का खिलाप पठानु कु जुलुस निकलणु छायीं। द्वितीय रॉयल गढ़वाल रैफल का कांधों पर पठानु तैं रोकणा की जिम्मेबरि छायीं। अंग्रेजु न पाठनु तैं बोलि, “भागी जावा! नथर गोली चलि जाली”। अंग्रेज अफसरु धमकौंणा बाद पाठन नी भागा, त अंग्रेज़ कप्तान रिकेलन गढ़वाली सैनिकु तैं बोली, “गढ़वाली! थ्री राउंड फायर।” तबि बीच बटि एक आवाज ऐ “गढ़वाली! सीज फायर।” जन्नि या आवाज ऐ, उन्नि गढ़वळि सैनिकौंन अपणि रैफल भ्वां क तरफा कै दींन। या अवाज छै गढ़वाल रैफल का हवलदार मेजर चन्द्र सिंह भण्डारी की। यीं घटना न चन्द्र सिंह भण्डारी तैं ‘चन्द्र सिंह गढ़वाली’ नाम द्यायी, अर पेशावर काण्ड कु महानायक बणै दे।

चन्द्र सिंह गढ़वालि की वीरता अर विचारधारा से खुस ह्वेकैकि महात्मा गांधी जी न एकदा बोलि छायीं कि, “अगर ऊंका दगड़ि चन्द्र सिंह गढ़वाली जन्न चार मनखि हौरि हूंद, त देस कब कु आजादा ह्वे जांदु।”

पर आज सत्ता मा बैठ्यां लैंसडौन का विधायक वीर चन्द्र सिंग गढ़वळि तैं निरबुद्धि बतौंणा छन। लैंसडौन का विधायक दलीप रावतन एक कार्यक्रम मा बोलि कि, चन्द्र सिंह गढ़वाली निरबुद्ध छायीं। इल्लै उन्न या क्रांति कायी। उन्न बोलि “क्रांति बुद्धिहीन मनखि हि करदु; उन्न बोलि बुद्ध वळु मनखि त तर्क-वितर्क करदु।” दलीप रावत कु इन्नु ब्वनु न सिरफ स्वतंत्रता संग्राम कु अपमान हि नी च, बल यु वीं बुन्याद, राजनीतिक चेतना कु बि ठट्टा बि च, जै न भारत देस तैं आजाद कायी।

विधायक कु यु ब्वनु की बुद्धिमान मनखि सिरफ तर्क-वितर्क करदु, पूरि तरौं गलत च; किलैकि क्रांति कबि बि बिना बुद्धि की नी ह्वे सकदि। किलैकि अन्याय तैं सैन करणु अर यांका वास्ता कुतर्क खोजणु कायरता ह्वे सकदि, बुद्धि कतै ना।

जब वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली न निहत्था लोक्खु पर गोली चलौंण से मना कै छायीं, वु फैसला क्वीं निरबुद्धि (मूर्ख) मनखि कु त कतै नीं छायीं। इन्नु फैसला त तेज दिमाग, बड़ी जिकुड़ि वळु मनखि हि ले कसदु छायीं; जैन झट सोचि विचार कायी अर ‘गढ़वाली/सीज फायर’ बोलिकि निहत्था लोगु फर गोलि चलौंण से साफ मना कै दे। या छायीं चन्द्र सिंह गढ़वाल सूझ-बूझ अर मनख्या।

अब अगर कुछ लोक्खु इन सोचदन कि क्रांति त सिरफ निरबुद्धि लोग करदन, त क्य दुन्यम, जुु बड़ी-बड़ी क्रांति का नायक छायीं, वु सबि निरबुद्धि छायीं? जरा सोचा- महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अर उत्तराखंड का श्रीदेव सुमन; क्य यीं सबि निरबुद्धि छायीं? त यांकु जबाब च कि कतै ना!

शहीद भगत सिंगन त जेल मा बैठिकि ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ जन्नि पोथी लेखि छायीं। क्य वु बिना दिगाम कु ह्वे सकद? कतै ना!

दलीप रावत ऐ बयान का बाद सवाल उठाया बिल्कुल सै छन। सवाल त दलीप रावत फर बि छन कि क्य दलीप रावत अपणि शैक्षिक योग्यता का बल फर विधायक बण्यां छन? क्य दलीप रावत यु बताला की कोटद्वार सिद्धबली का महंत बणणा खुणि क्य योग्यता च?

भारतीय लोकतंत्र मा एक चपरसी बणणा खुणि बि पढ़ू-लिख्यूं हूंण बौत जरूरी च, पर एक विधायक बणण वास्ता क्वीं उच्च शिक्षा की कतै जरुरत नी च। दलीप रावत तैं विधायक कु पद क्वीं वैज्ञानिक खोज का वास्ता नी मिलि, दलीप रावत तैं विधायक कु कुर्सी भाजपा कु टिकट अर भाजपा की लहर क अधार पर फर मिलि। यामा सबसे जादा खास बात च कि दलीप रावत तैं उत्तराखण्ड पूर्व मुख्यमंत्री खण्डुडी जी का नजीक अर ऊंका बुबा जी राजनीतिक असर (विरासत) का कारण मिलि।

अब अगर ऊंका धार्मिक पद की बात करदौ, त बाबा सिद्धबली मंदिर सर्या उत्तराखड अर देस मु आस्था कु केंद्र च। यख क्वीं बि पद का वास्ता शैक्षिक योग्यता से जादा पारिवारिक, क्षेत्रम अर राजनीतिक प्रभाव जादा खास च, जै कारण वु तैं यु पद मिलि।

दलीप रावत विधायक की कुर्सी मा बैठिकि आज ‘बुद्धि’ कु मतबल बतौंणा छन। त या कुर्सी बि विधायक दलीप रावत तैं, वै आजाद भारत का लोकतंत्रन द्यायी, जैकि बुन्याद वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली जना क्रांतिकारियौंन अपणा बलिदान से धैरि छायीं। अर वांका बाद उत्तराखण्ड शहीद अर राज्य आंदोलनकारी, जौका कारण यु उत्तराखण्ड बणि। अब अगर देस आजाद नी हूंद अर उत्तराखण्ड नी बणदु, त दलीप रावत कबि बि विधायक नीं हूंदा।

विधायक दलीप रावत कु यु बयान ऊंका विचारिक संकीर्णता अर इतिहास कम जाणकारी तैं बतान्द। दलीप रावत तैं समझण चैंद की सिरफ सत्ता की कुर्सी कतै बि इतिहास क महानायकु कु मूल्यांकन करणा कु अधिकारी कतै नी देंदु। वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली कु हिकमत अर सास (साहस) पर अंगुला उठौंण सूरज तैं दीपक दिखौंण जनु च।

इन्न बयान का वास्ता विधायक दलीप रावत तैं माफी नी मंगण चैंद, बल विधायक की पार्टी तैं बि स्वचण चैंद, आत्ममंथन करण चैंद की क्य हम अपणा महानायकु कु अपमान का दगड़ि खड़ा छौ?

लोकतंत्र मा जनता सब देखणि च अर इतिहास गवाह च, जनता कु ‘तर्क-वितर्क’ जब चोट करदु, त बड़ा से बड़ा पद फर बैठ्यां लोगु कु घमंड माटू मा मिलि जांद।

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