बदरीनाथ मा शंख आस्था अर तथ्य
बदरीनाथ धाम मा शंख किलै नी बजै आंद? यु सवाल क्वीं नै नी च। हां अज्काल यु सवाल इल्लै चर्चा मा च कि किलैकि उत्तराखण्डा धर्मस्व अर पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज न बदरीनाथ मा शंख नीं बजाणा कु कारण बतै कि शंख गौरु की हडकौं (हड्डी) से बण्यूं हूंद अर हडका मंदिर नी लिज्यें जान्द। महाराज का ये बयाना बाद धामिक परंपरा अर वैज्ञानिक तथ्य तैं लेकैकि एक बहस छिड़ग्ये। त पैलि या बात साफ हूंणि बौत जरुरी च कि शंख क्वीं गौरु की हड़कि कु नी च। शंख समुद्रा मोलस्क जैका माने च एक तरौं का समुद्री जीव कु कटकुटु खोळ च। शंख कैल्शियम कार्बोनेट कु बण्यूं हूंद। माने साफ च कि शंख तैं हडुक ब्वनु कतै सै नी च। किलैकि हडका कोलेजन नौ कु प्रोटीन अर कैल्शियम फॉस्फेट से बणदि।
अब भगवान बदरी नाथ मा शंख किलै नी बजदु त या का पिछने अलग-अलग धार्मिक मान्यता छन। बदरीनाथ का पैल्यक धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल कु ब्वनु च कि शंख भगवान कु आह्वान का वास्ता बजै जांद, पर बदरीनाथ मा त भगवान विष्णु साक्षात छन। इल्लै बदरीनाथ मा शंख बजौंणा कु जरुरत हि नी च। यांका दगड़ि तुलसी अर शंखचूड़ से जुडि पौराणिक मान्यता तैं बि यीं परंपरा दगड़ि ज्वड़े जांद। ब्वलें जांद कि बदरीनाथ मा माता लक्ष्मी तपस्या करण छायीं। भगवान विष्णुन जब शंखचूर्ण कु वध कायी त जीतणा बाद उन्न शंख इल्लै नी बजै कि कखि शंख बजौंणा से माता लक्ष्मी तपस्या भंग नीं ह्वे ज्यां। बाद म बदरीनाथ मा शंख नी बजौंणा की यीं परंपरा से ज्वडे़ ग्यायी।
अब बात या च कि जब बात भगवान की परंपरा की हूंद त यांका बारम बौत सोचि समझि की ब्वन चैंद, किलैकि धार्मिक आस्था से जुड्या मामला मा एक बि बात फर बहस ह्वे सकद। खास कैकि तब, जब ब्वन वलु मनखि प्रदेस सरकार मा धर्मस्व, पर्यटन जन विभाग कु मंत्री की जिम्मेबरि संभलणु च।
सतपाल महाराज उत्तराखण्ड का धार्मिक पर्यटन अर संस्कृति का मंत्री छन। इन्न मा उंका ऐ बयान तैं सूदि नी लिंण चैंद। अर उन्न बि जब क्वीं बडु आदिम, जु धार्मिक गुरू बि च, वै की बात फर लोग बिना स्वच्यां विस्वास कै दिंदन। इन्न मा महाराज जी से इन्न उमेद करे जांद की ऊतैं धार्मिक मान्यतौं का दगड़ि विज्ञानिक तथ्यों कु बि ध्यान रखण चैंद। शंख तैंं गौरु की हडको कु बताणु महाराज की गलती च। सतपाल महारान कु बयान की बदरीनाथ मा शंख इल्लै नी बजै जांदु की शंख गौरु का हडका से बण्यूं हूंद या बात कतै सै नी च।
बदरीनाथ धाम जमनौं बटि लोगु की आस्था कु केंद्र च। अगर यख शंख नी बजौंणा कु क्वीं खास धार्मिक कारण च त, वैकु सै मतबल बतै जाण चैंद, ना कि शंख तैं गौरु का हडकौ कु बतौंणा जना गलत ब्वना की जरूरत च। धार्मिक मान्यता की जाणकारी बतौंण हि वैंकी गरिमा तैं बणैकि की रखणा कु तरीका च। आस्था अपड़ि जगा च अर तथ्य अपणि जगा। हां परंपरा कु मान करणा का वास्ता गलत जाणकारी कतै नी दिए जाण चैंद।
देवभूमि की धार्मिक परंपरा सिरफ हमरि आस्था कु सवाल नीं च, बल हमरि सांस्कृतिक विरासत बि च। इल्लै यांका बारम ब्वलद दा हमतैं न त अधंविश्वास तैं विज्ञान ब्वन चैंद अर न ही विज्ञाना नौ फर हमरि पूरणि आस्था पर चोट करणि चैंद। बदरीनाथ मा शंख किलै नी बजये जांद, यां कु जबाब हमतैं हमरि परंपरा मा खोजण चैंद। लेकिन शंख क्या कु बण्यूं हूंद, यांकु जबाब विज्ञान मा ख्वण चैं। आस्था अपणि जगा च अर तथ्य अपणि जगा। बदरीनाथ मा शंखनाद की परंपरा फर चर्चा ह्वे सकद, अर यांका खुब पड़ताल बि हूंण चैंद पर चर्चा की सुरुवात हि गलत जाणकारी से हूंण से भरम दूर त नी होलु पर बढ़ि जरुर जालु।
