आखिर सवाल से डैर किलै?

लोकतंत्र की खास बात सिरफ चुनौ करोंणा मा हि नी च, बल लोकतंत्र मा हरेक मनखि तैं अपणि बात ब्वना कु, सरकार से सवाल पुछणा कु अर गलत का खिलाप अवाज उठौंणा कु अधिकार देंणा मा बि च।

चुनौ लोकतंत्र की बुन्याद च, पर मतदाता सूची मा कै मनखि कु नौं हि नी रालु त वैका मताधिकार कु क्य मतबल रै जालु? यीं सवाल आज विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) तैं लेकैकि उठणा छन। क्राकरोज जनता पार्टी अर विपक्षी दलुन चुनौ आयोग की काम करणा तरीका फर सवाल खड़ा करणा छन।

एसआईआर कु मकसद मतदाता सूची तैं साफ करणु च, जैमा म्वर्यां (मृत) मनखि, जु हौर जगा चलिग्येन अर जौंका द्वि जगा मतदाता सूची मा नौं छन, ऊंतै हटाणा कु च। यां फर कैथै बि क्वी दिक्कत नीं हूंण चैंद, किलैकि साफ-सुथरू चुनाव का वास्ता सही मतदाता सूची बौत जरूरी च। लेकिन यांका बाद सवाल यों च कि मतदाता सूची तैं सही करणा मा कखि सही मतदाता कु नौं हि त नी कटिग्ये? कतगै इन्ना लोग छन जौं मा अपण पूरणा कागज नीं छन। इन्न मा जु लोग सिर्फ कागज नीं हूंण से इन्नि दिक्कत झल्यणा छन, त ऊंकी सिकायत (शिकायत) तैं सूंणणु बि चुनौ आयोग की जिम्मेवारी च।

अब सवाल यु बि च एसआईआर पर सवाल खड़ा करणा कु मतबल लोकतंत्र कु विरोध कन्नु कै कि ह्वे? एसआईआर का खिलाप अवाज उठण वलि हरेक अवाज तै सिरफ राजनैतिक विरोध या फिरे चुनौ मा हारणा की डैर बोलिकि दबौंणु कतै सै नीं च। राजनीतिक दल की मसा फर सवाल ह्वे सकदन, पर ऊंका उठयां सवाल पर बिना जांच कर्या गलत नीं बतै जै सकदु। अगर अरोप गलत छन त चुनौ आयोग तै जवाब देंण चैंद।

एसआईआर फर विवाद मतदाता सूची तक हि नी रै ग्यायी। मुख्य चुनौ आयुक्त ज्ञानेश कुमार अर चुनौ आयुक्त सुखवीर सिंह संधू अर विवेक जोशी की जिम्मेबरि फर बि सवाल उठणा छन। यखम एक सवाल यु बि खडु हूंद कि क्य देस की सबसे बड़ी चुनावी संस्था का फैसला वैका काम करणा का तरीका पूरि तरौं पारदर्शिता च? चुनौ अयोग की स्वतंत्रता सिरफ संवैधानिक प्रावधानु मा हि ना बल जनता का विश्वास से बि मजबूत हूंद। इल्लै आयोग तैं अपणा फैसलों का बारम उठणा सवालु का साफ जवाब देंण चेंद।

अब ये विवाद मा एक हौरि बात समणि ऐ वा च की एसआईआर का विरोध मा धरना देंण वलों का दगड़ि ब्यौहार। क्राकरोज जनता पार्टी अर हौरि संगठन का धरना प्रदर्शन पर दिल्ली मा सुरक्षा बढ़ै ग्यायी, लोगु तैं पुलिसन पकड़ि, जंतर-मंतर फर नी जाणि द्यायी। सरकार अर पुलिस कु ब्वनु की कानून बन्दुबस्त का वास्ता इन्नु करे ग्यायी, लेकिन बडु सवाल हि यों च कि क्य कानून-बन्दुबस्त का नौं फर विरोध की अवाज तैं दबै जाण चैंद?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (ं) देसा रैवासियों तैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा देन्द, अर अनुच्छेद 19 (1) (इ) शांतिपूर्ण अर बिना हथियार जमा हूंणा कु अधिकार दिन्द। पुुलिस तैं यातायात, सुरक्षा अर शांति बणौंणा वास्ता नियम बणौंणा कु अधिकार च, पर या सबि रोक सै अर जरूरी हूंण चैंदन। धरना प्रदर्शन शांति बणौंणा मा अर वैथै पूरि तरौं दबाणा का बीच साफ फरक च। अगर जंतर-मंतर पर धरणा देंणा मंजूरि नीं दिए जांद त यांका बारम साफ बतै जांण चैंद की आखिर किलै मंजूरि नी दिएग्ये। अगर मंजूरि की सर्त (शर्त) त्वड़े जांद त कानूनुसार कारवै हूंण चैंद। मगर सिरफ ऐ अधार पर की धरना सरकार या फेरि संवैधानिक संस्था का खिलाप च, धरना की मंजूरि नीं देणु यु कतै सै नीं च।

धरना-प्रदर्शन करणा वालों तैं रोकणा वास्ता ऊंका दगड़ि मारपिटै करणा वालों पर बि सवाल खड़ा हूंणा छन। धरना कु विरोध करणा वास्ता कुछ संगठनों पर मारपिटै का आरोप लगणा छन, यांकी निष्पक्ष जांच हूंण चैंद। यखम सवाल पुलिस-प्रशासन फर बि छन कि आखिर पुलिसन धरना देंण वालों तैं रोकणा वास्ता पूरि कोसिस कायी, त हिंसा अर मारपिटै करणा वालों तैं रोकणा या पकड़णा की कोसिस किलै नी कायी?

कै बि राजनैतिक दल की विचारधारा कु विरोध करणु देसा का हरेक रैवासी कु अधिकार च। हरेक संगठन तैं अपणा विचार रखणा कु अर विरोध करणा कु अधिकार च, पर दूसरा नागरिक तैं पिटणा कु, डरौंणा कु या ऊंकी अवाज दबांणा कु अधिकार कैथै बि नी च। कानून कु पालन करौंणा की जिम्मेवारी पुलिस अर प्रशासन की च, कै राजनीतिक या विचारधारा का संगठन की नीं।

क्वीं संगठन कैकु धरना देंण से जिंगरेणू (असहमत) च अपणु बिरोध कै सकद, बहस कै सकदु अर अपणि सै बात बोलिकि जवाब दे सकदू। लेकिन अगर बिचारू का जबाब द्विया तरफा बटि लाठन हि दिए जालु। इन्न मा नुकसान सर्या समाज कु हि होलु।

सरकार का समणि आज बड़ी जिम्मेबरि च, पैलि मतदाता सूची तैं सै करणु अर यु दय्खणु की क्वीं बि देसा नागरिक कु बोट नीं कटे ज्यां। दूसरू विरोध करणा वला लोगु का संवैधानिक अधिकारी की रगक्षा करणु। सरकार अर चुनौ आयोग तैं एसआईआर , नौं हटाणा कु अधार, दूबरा नौं ज्वड़णा की व्यवस्था की सर्या जाणकारी देंण चैंद। एसआईआर मा लोगु तैं अपणि गलती तैं ठीक करणा वास्ता बग्त मिलण चैंद।

एसआईआर पर कटवट (मतभेद) ह्वे सकदन। चुनौ आयोग फैसला पर सवाल खड़ा ह्वे सकदन। मुख्य चुनौ आयुक्त का इस्तीफा की मांग बि विरोध कु हिस्सा ह्वे सकद। इन्नु मांगु फर लोगु का अर राजनैतिक दल का अपड़ा-अपड़ा विचार ह्वे कसदन। लेकिन कै बि मांग तैं गलत साबित करणा का वास्ता सै जाणकारी, कानून अर लोकतांत्रिक जबबा च, बहस च, ना की मारपिटै अर धमकौंणु।

आज सबसे बडु सवाल हि यौं च कि क्य भारत का रैवासियों तैं सिरफ मतदान का दिन हि अपणा विचार रखणा कु अधिकार च, या फेरि ऊं चुनौ प्रक्रिया का दौरान फर सवाल बि पूछि कसदन? क्या कै संवैधानिक संस्था से जबाब मंगणु वैंकु छचकार (अवमानना) च? क्या सरकार की अलोचना करणु वलु हरेक मनखि सरकार बिरोधी च, देसबिरोधी च?

धरना देंण न त गलत च अर ना कह क्वीं जुरम। सिरफ राजनीतिक विचार नी मिलण कारणा धरना रोकणा का वास्ता धरना देंण वलों तैं लाठा मारिकि चुप करौंणा कतै लोकतंत्र नीं च।

लोकतंत्र की तागत यीं बात से नी नपै जांद कि सरकार का खिलाप कतगा अवाज उठणी छन, बल या यीं बात से नपै जांद कि सरकार अपणा खिलाप उठण वलि अवाज तैं कतगा सबर (सहनशीलता) से सुणंद।

एसआईआर पर उठण वला सवालों का जवाब दिए जांण चैंदन, मतदाताओं की सिकैतों कु समाधान हूंण चौंद, अर हिंसा करणा वालों पर निष्पक्ष कार्रवाई हूंण चैंद। लोकतंत्र मा असहमति कु जवाब सहमति या तर्क से, आरोपों कु तथ्य से अर विवादों कु समाधान संविधान से हूंण चैंद, न कि डंडा से।

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