सिद्धपीठ माँ ज्वाल्पा
पौड़ी-कोटद्वारा बाटम नयार गदना (नदी) कु छाल पर सिद्धपीठ माँ ज्वाल्पा कु पौराणिक मंदिर च। ये पीठक बारम ब्वलें जांद की यख औंण वळा हरेक मलखि की मनोकामना पूरि हूंद।
स्कंदपुराणानुसार सतयुग मा दैत्यराज पुलोम की नौनि शची न देवराज इंद्र दगडि ब्यों करणा वास्ता नयार छाल पर हिमालय की अधिष्ठात्री देवी माँ पार्वती की तपस्या कायी। माँ पार्वती शची की तपस्या से देखिकि खुस ह्वे अर दीप ज्वालेश्वरी क रूप मा शची तैं दर्शन दींन अर ऊंकी मनोकामना तैं पूरि कायी। माँ पार्वतीक ज्वाल्पा रूप म दर्शन देंणा कारण यीं जगा कु नौं ज्वाल्पा पोड़ि।

माँ पार्वती कु दीप्तिमान ज्वाला कु रूप मा प्रकट हूंण कु प्रतीक अखंड दीपक यख लगातार जगणु रैंद। यांका वास्ता पूरण जमना बिटि मवालस्यूं, कफोलस्यूं, खातस्यूं, रिंगवाडस्यूं, घुड़दौड़स्यूं अर गुराडस्यूं पट्टयोंक गौं का बिटि लय्या (सरसों) कु तेल जमा कैकि मां कु अखण्ड द्यु (दीपक) जगौणु कु बन्दुबस्त करदन। माँ ज्वाल्पा थपलियाल अर बिष्ट जाति क लोगुक कुलदेवी च।
माँ ज्वाल्पा धाम की स्थापना कब अर कनु कै ह्वे यांका बारम लोगु कु अलग-अलग ब्वनु च। कुछ लोग ब्वदन की माँ ज्वाल्पा कांगड़ा की ज्वालामाई बिटि माँ यख ऐ। त कुछ ब्वदन की लूंणा ब्वर्यां मा (बोरी) माँ लिंग रूपम माँ प्रकट ह्वे। पर स्कन्दपुराण म पुलोमा की नौनि शची की तपस्या अर वींतैं माँ पार्वती का दर्शन दींण वलि बात तैं हि मान्यता दिये जांद।
18वीं शताब्दी मा राजप्रद्युम्नशाह न मंदिर का वास्ता 11.82 एकड़ जमीन दान द्यायी। यीं जमीन मा आज बि लय्या (सरसाें) की खेती कैकि अखण्ड जोत खुणि तेल निकलें जांद।
माँ ज्वाल्पा मंदिरम सिद्धिपीठ मां ज्वालपा चैत्र अर शारदीय नवरात्रों मा खास पूजा पाठ हूंद। यख खास कैकि अणब्यो नौनी अप्फु खुणि अच्छु ब्योला की कामना वास्ता माँ ज्वालपा की पूजा करदन।
मां ज्वाल्पा सिद्धपीठ पौड़ी कोटद्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग पर पौड़ी बिटि 33 किलोमीटर अर कोटद्वार बिटि 73 किलोमीटर दूर नयार गदना कु छाल फर च।
