शक्तिपीठ कालीमठ

ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।

प्रकृति की खुचिलम बस्यूं प्रसिद्ध शक्तिपीठ कालीमठ मंदिर, रुद्रप्रयाग मंदाकिनी घाटिम गुप्तकाशी से 10 किलोमीटर दूर च। सम्रोद तल से 1463 मीटर ऊंचै पर केदार शिकाह अर चौखम्बा कु भीटौ (ढाल) पर काली गदना कु छालम माँ काली का शक्तिपीठ च। पूरण जमना बटि यख माँ काली की पूजा हूंद।

भागवत कथा मा लिख्यूं च कि ये क्षेत्रम मनसूना जगा म द्वी खबेस (राक्षस) शुम्भ अर निशुम्भ रैंदा छायीं। अर द्विया खबेस देवी-द्यब्तौं तैं खुब परेसान करदा छायीं। शुंभ-निशुंभ से परेसान देवी-द्यब्तौं न माँ भगवती की तपस्या कायीं तब माँ प्रकट ह्वे। द्विया खबेसु बारम सुणिकि माँं सर्या शरैल गुस्सम काळु पोड़िग्ये अर माँ न विकराल रुप धारण कै द्यायी। माँ न द्विया खबेसु दगड़ि लडै़ कायी अर द्वियौं तैं मारि दे। इन्न ब्वलें जांद की माँ दुर्गान शुंभ-निशुंभ अर रक्तबीज तैं मरण वास्ता 12सालै छ्वटि नौनि रूप मा प्रकट ह्वे छायीं

माँ भगवती कु शक्तिपुंज क रूपम छन कालीशिला अर कालीमठ। कालीशिला माँ काली कु प्रकाट्य स्थल च। जु कालीमठ माँ कु अंर्तध्यान स्थल रूप मा प्रसिद्ध च। कालीशिला म देवी-द्यब्तौं का 64 यंत्र छन। माँ तैं यु 64 यंत्रु से हि तागत मिलि छायीं।

कालीशिला लगभग 8हजार फुटै चढ़ै पर कालीमठ से 8 किलोमीटर दूर च, त कालीमठ काली गंगा (जैथैं सरस्वती बि ब्वलें जांद) क छाल पर च। ।

इन्नु बि ब्वलें जांद कि माता सती न पार्वती क रुप मा दूसरू जन्म यीं शिलाखंड मा हि ल्यायी। कालीमठ मंदिर नजीक माँ न रक्बीज तैं जब मारि त वैंकु ल्वै भ्वा नीं गिरयां इल्लै मां न वैकी ल्वै तैं चाटुण सुरु कै द्यायी। रक्तबीज शिला आज बि च। यीं शिलाम माँ न रक्तबीजा मुण्ड धैरि छायीं।

मान्यता च कि जब माँ महाकाली जब शांत नीं ह्वे तब भगवान शिव माँ का खुट्टौं मा पोड़िग्येन। तब माँ कालीन भगवान शिवजी की छातिम खुट्टु धैरि अर शांत ह्वे अर ऐ कुण्ड मा अंर्तध्यान ह्वेग्यायी। इन्न ब्वलें जांद कि माँ महाकाली ऐ कुंडम समयीं च।

कालीमठ मंदिरम कु यु कुंड रजटपट श्रीयंत्र से ढकयूं रैंद। शरदीय नवरात्रु मा अष्टमी दिन ये कुंड तैं ख्वलें जांद।

कालीमठम शिव-शक्ति स्थापित छन। यख महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, गौरी मंदिर अर भैरव मंदिर छन। यख अखण्ड जोत सदनि जगणि रैंद। कालीमठ मा मां काली, श्री महालक्ष्मी अर महा सरस्वती तिन्या शक्ति की पूजा हूंद।

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