धराली आपदा : हिमालय खबरदार करणु च
बिगरैळु अर प्रकृति सौंन्दर्य खुणि सर्या दुन्या म जैकि हाम छायीं वे उत्तरकाशी का बाटा मा प्वड़णु वलु धराली आज सुन्न प्वड़यु च। वख रैवासियों का गौं-गुठ्यार, घौर-बार, कारौबार सबि खतम ह्वेग्ये।
दिन द्वपरा मा सरग मा बादल, इन्न त पाडै़ रैवासी रोज हि द्यखदन। पर अचाणचक सरगन जन्न अपड़ा सर्या द्वारा खोलि दींन। जु बि वैका समणि ये बोगिग्ये। पुळ, दुकान कुड़ा, जु बि समणि ऐ बोगिग्ये, पैलि त लोगुन इन्न समझि कि बादल फटि होलु पर जब देखि कि यख त पाणि कम अर कीच (गाद) जादा च, तब लोगुक समझम ऐ कि यु क्वीं बादल फटण नीं च या त जलवायु जनित आपदा च।
यखम सवाल यौं च कि क्य यु सब अचाणचक ह्वे? त यांकु जवाब च ना। हिमालय हमतैं लगातार खबरदार करणु च, अर हमन प्राकृतिक दी यीं चेतावनी तरफां बिटि सदनि मुख-फेरि द्यायी।
हमन विकास नौं पर सबसे जादा पाड़ु कु नुकसान हि कायी। कबि सड़क, त कबि बिजली बणौंणा नौं फर, त कबि पर्यटनक् नौं फर गारा, सीमेंट अर लुव्वा (लोहा) का पाड,़ पर्यटकु तैं सुख सुविधा देंणा वास्ता पाड़ै जिकुडि पर हि खड़ा करनि। त कबि अपड़ा फैदा वास्ता हमन अपणा बोण (जंगल) खळाखळ काटिकि पाड़ै जिकुडिम खड्वळा करिन।
यांका बाद हौरि काम भैर बिटि पाड़ धुमणा खुणि औंण वला पर्यटकु न कै दे, उन्न प्लास्टिक अर हौरि प्रदूषण फैलै कि पाडै़ सुन्दरता तैं खतम कै द्यायी। यांकु नतीजा धराली मा जु ह्वे, वु हमर समणि च।
विकास हूंण चैंद, विकास हम सब्यौं कु हक च। किलैकि बिना विकास जिन्दगि अगनै नी बढ़ि सकदि। पिछल कुछ सालु बिटि हिमालय का प्रदेस प्राकृतिक आपद क् पिड़न रुणा छन। इन्न मा सवाल सिरफ केदारनाथ, ऋषिगंगा अर धराली आपदा मा हूयां नुकसान कु नीं च, असल सवाल त यौं च कि यु यौं च कि अवैज्ञानिक तरीकौं से विकास अर नियमा खिलाप काम करणा की लोगु आदत कब तक लोगु जिन्दगि पर गर्रि (भारी) प्वाड़लि।
धराली आपदा बाद अब हमतैं स्वचण प्वाड़लु। स्वचण हि ना बल सिखण बि प्वाड़लु। किलैकि प्रकृति तैं बचौंणा हमरि बि जिम्मेबरि च, हमतैं पाड़ म निर्माण काम इन्न नी करण चैंद, जै से पाड़ तैं क्वीं नुकसान नीं हूयां। अब सिखणा की बारी हमरि च नथर अगिल दा फिर क्वीं हौरि धराली क् बारी होलि?
