“गढ़वालै धै”: तैंतीस बरसै जातरा, गढ़वळि भाषा की जिद

जब दुन्या सूचना कु बथौं म बगणि च, जब खबर अखबार से जादा मोबैल पर दिख्येंणि छन, तब गढ़वळि भाषम एक साप्ताहिक अखबार तैंतीस बरस बिटि खळाखळ निकलणु, या एक उपलब्ध नी च त क्या च। या एक मेनत अर समर्पण की कहाणि नी त क्य च। कै मनखी ,कै समाज देश-राष्ट्र अर विश्व समाज की जिंदगी मा तैंतीस बरस बण्डि नि होंदा त कुछ कम बि नि होंदा।

जख आज कु बगत सोशल मीडिया कु च। चौबीस घण्टा न्यूज चौनल, डिजिटल पोर्टल, घड़ी-घड़ी की खबर दिंणा छन। यीं भिवड़ाट म सबसे जादा दिक्कत, वीं भाषा तैं ह्वे ज्वा बजारै भाषा नीं च। हमरि गढ़वळि बि इन्न एक भाषा च। हमरि दिक्कत या च कि ज्वां गढ़वळि बोलि-भाषा हमर पराण (आत्मा) छायीं वा भाषा आज हरचदा जाणि च। आज हमरि भाषा सिरफ कैसेटौं (गीत) की भाषा बणिग्ये।

यांका बाद बि गढ़वळि भाषम एक साप्ताहिक अखबार ”गढ़वालै धै“ तैंतीस बरस बटि ज्यूंदू च, या बड़ी बात च। अखबार हमतैं सिरफ खबर हि नीं देंदू , बल यु समलौंण, मेनत, हिकमत, परम्परा अर समाज कु ज्यूंदू दस्तावेज च। यु अखबार गढ़वळि भाषा तैं आस अर सांस दिंणु च, जै भाषा तैं आज ब्वलण-बच्याण मा बी लोगु सणि शरम आणि च।

‘गढ़वालै धै’ की यीं जातर की कठिणै तैं समझणु बौत जरूरी च। आज गढ़वळि भाषा का पढ़दरा बौत कम छन। तंगतंगी का हालात, गढ़वळि भाषम विज्ञापन देंदारु क्वीं नीं च अर सबसे बड़ी बात नै पीढ़ि ज्वा अपणि भाषा से दूर हूंदा जाणि च। अब स्वाचा कि जब पढ़दरा हि नी राला, त एक अखबार तैं ज्यूंद रखण तपस्या नीं त क्या च? यांका बाद बि ”गढ़वालै धै“ सौं लियीं च, की नुकसान कतगा बि हूंया अपणि भाषा अर संस्कृति की पूंछ कतै नीं छ्वड़ळा।

सोशल मीडिया कु ऐ जमनम जख हरेक बात झट हर बिना जिम्मेबरि की ब्वलें जाणि छन, वखि एक साप्ताहिक अखबार सबर (धैर्य), सच अर संतुलन की मिसाल बण्यूं च, यीं हमरि सबसे बड़ी तागत च।
भै-बंदो, ”गढ़वालै धै“ त अपणि कोसिस भर कनु च। सच त यो बि च गढ़वळि भाषा कु भवेष्य सिरफ ”गढ़वालै धै“ की कोसिस फर खडु नीं रै सकदु। यांका वास्ता हमर समाज तैं खास कैकि ज्वानु तैं अगनै ऐकि अपणि बोलि भाषा तैं अपनौंणु प्वाड़लु। जब तक हम अपिण भाषा म स्वचण, ब्वलण अर ल्यखण मा फकर नीं करला, तब तक अखबारै कोसिस सिरफ कोसिस हि राली। तैंतीस बरसा जातरा हमतैं यु सिखान्द कि भाषा तैं ज्यूंद रखण वास्ता सिरफ शब्द ना, बल हिकमत अर सबर (धैर्य) अर लगातार काम करण की जरूरत हूंद। ‘गढ़वालै धै’ अखबारै बि इन्नि जिद च, जिद ज्वा जै जमना से लड़णि च पर हार नी कतै नी मनणि च।

गढ़वालै धै’ अखबार तैं तैंतीस बरस पूरू हूंणु सिरफ एक संस्थान कु त्योवार नीं च, बल यु गढ़वळि भाषा, संस्कृति पर हमरि पछ्याण कु त्योवार च। यु हमतैं बतांद की हम अपड़ा जलड़ा से जुड़या रौला त, क्वीं बि तागत हमतैं कबि बि खतम नीं कै सकदि।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *