शक्तिपीठ “माँ नैनादेवी”
“नयने नयने नित्यं, नयने नैना रूपिणी।
नन्दिता नन्दिता नित्यं, नन्दनन्दन रूपिणी॥”
उत्तराखण्ड नैनीताळम नैनी झीलक छाल माँ नैनादेवी कु पवेत्र अर प्रसिद्ध शक्तिपीठ च। पौराणिक कथा च कि या माता सती कु आंखा गिरि छायीं। जैका बाद यीं जगा तैं नैना देवी क रूपम पूज्यें जांद। नैनी देवी कुमौ क्षेत्रा की कुल देवी च।

मान्यता च कि राजा दक्ष प्रजापति की एक नौनि सती कु ब्यो शिवजी दगड़ि ह्वे। दक्ष प्रजापति तैं शिवजी दगड़ि सती कु ब्यो कतै पसंद नीं छायीं। द्यब्तौं कु ब्वन फर उन्न सती अर शिवजी कु ब्यो करै द्यायी।
एकदा जब प्रजापति दक्षन हरद्वारम एक यज्ञ उर्याईं त उन्न यज्ञ मा अपणि नौनि सती अर भगवान शिव तैं न्यूतो नीं द्यायीं। माता सती बिना न्यूत्यां यज्ञ मा पौंछिग्यायी।
यज्ञम माता सती न वख सबि द्यब्तौं कु सम्मान अर शिवजी कु निरादर देखि त माता सती बौत दुखी ह्वेग्यायी। नराज माता सतीन ‘अगिल जन्म मा शिवजी दगड़ि हि ब्यो करलु, तुमन म्यार जवैं कु जु अपमान कायी, मि तुमरू यज्ञ तैं विफल करदु’ इन्नु बोलिकि हवन कुण्डम फाल मारि द्यायी अर कुण्ड मा समैग्ये।
जब या बात भगवान शिव तैं पता चलि त उन्न राजा दक्ष तैं मरणा वास्ता अपणा गणु तैं भेजि। भगवान शिव का गणनु राजा दक्ष कु यज्ञ तैं छिन-भिन कै द्यायी। भगवान शिव हवन कुंड बिटि माता सती कु शरैल तैं अपणा कांधम धैरि अर अगास म भटकण बैठिग्येन। यीं घटना बात सर्या सृष्टि हिलण बैठिग्ये।
भगवान शिव कु यु क्रोध देखिकि सबि द्यबता भगवान विष्णुम गैनी। तब भगवान विष्णुन अपड़ा चक्र से माता सती का शरैल 51 कतर कै दीं। जख बि माता सती का अंग गिरिन वख-वख शक्तिपीठ बणिन। यख सती मा आंखा (नयन) गिरिन, इल्लै यीं जगा नैना देवी कु नौ से जणे जांदा। तबि बटि यख सती की पूजा नैनादेवी क रूपम हूंद।
नैनादेवी मंदिर भक्त दूर-दूर बटि आशीर्वाद लेंणा खुणि आंदन।
