माँ चंडिका देवी
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके। हूं हूं फट् स्वाहा॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

चंडी देवी कु मंदिर हरद्वारम च। ब्वलें जांद यु हि सिरफ एक मंदिर च जख माँ चंडी खंभ कु रूपम प्रकट ह्वे छायीं, यु माँ कु क्रोध वलु रूप च। त दूसर तरप माँ कु शांत रूप दुर्गाक रूपम स्थापित च।
चंडी देवी कु यु मंदिर हिमालय की दक्षिण पर्वत श्रंृखला शिवालिक पाडै़ पूर्वी शिखरा नील पर्वतम च। चंडी देवी हरद्वारै पंच तीर्थोंम बटि एक तीर्थ, त हरद्वारा तीन पीठ मनसा देवी अर माया देवी बटि एक च।
पौराणिक कथा
पौराणि कथा च की पूरण जमना मा शुंभ अर निशुभ नौ का द्वी खबेसुन द्य्बतौं इंद्र कु राज्य फर कबजा कै द्यायी। अर द्य्बतौं तैं स्वर्ग बटि भैर भगे द्यायी। जैका बाद द्य्बतौं न माँ पार्वती से विनती कायी त माँ पार्वती न चंडी कु रुप धैरिकि खबेसु समणि ऐग्ये। इल्लै देवी चंडी तैं चंडिका बि ब्वलें जांद।
माँ चंडी कु रूप देखिकि शुंभन माँ से ब्यो करणा लालसा कायी। मना करण फर शुंभ न माँ तैं मरणा वास्ता बेस चंड अर मुंडा भेजि, पर देवीन द्वियों तैं मारि दे। वैका बाद शुंभ अर निशुंभ न माँ तैं मरण कोसिस कायी पर देवीन द्वियौं खबेसु तैं बि मारि द्यायी।
वैका बाद माँं चंडिका न नील पर्वत पर थ्वड़ा देर अराम कायी अर वैंका बाद मां चूप ह्वेकैकि यखि विराजमान ह्वेग्यायी। इन्न ब्वलें जांद कि यीं जगा पर एक मंदिर बण्यें ग्यायी। अर द्वी पाड़ तैं शुंभ अर निशुंभ नौ से जणे जांद। मंदिरम माँ की ज्वां मूर्ति च वा 8वीं शताब्दी आदि शंकराचार्य न स्थापित कै छायीं।
हरद्वारम माँ मनसा देवी बीचम माँ माया देवी अर माँ चंडी देवी एक त्रिशुल रूप में हरद्वारा रक्षा करणि छन।
