अंकिता तैं निसाब दिलौंणै ‘धै’

उत्तराखण्डा नौनि अंकिता भण्डारी तैं निसाब दिलौंणा की मांग अब सिरफ एक नौनि, एक कुटुम्दरि की हि ना बल या लडै़ अब नौनियों कु अस्तित्व अर सुरक्षा लड़ै बणिग्यायी, ज्वां ये देसा कानून अर व्यवस्था पर भरोसु कैकि जींण चाणि छन। अंकिता तैं निसाब (न्याय) दिलौंणै ‘धै’ (आवाज) अब सिरफ प्रदेसा सड़कियों मा हि नी रै ग्यायी, यीं लड़ै की ‘धै’ अब उत्तराखण्डा द्वी नौनियों जरिया राष्ट्रपति तक पौंछिग्ये।

अल्मोड़ा जिला की कक्षा दशम पढ़ण वलि द्वी नौनियों अपणा खून से राष्ट्रपति तैं चिट्ठी लेखि। राष्ट्रपति तैं लिखि ऐ चिट्ठी मा वु नौनियों न लेखिकि तुम ऐ मामला मा हस्तक्षेप कारा। उन्न यीं चिट्ठी मा सिफर अंकिता तैं निसाब दिलौंणा बात हि नी कायी, बल वीआईपी संस्कृति पर बि सवाल खड़ा करिन। जु सदनि अप्फु तैं कानून से बड़ी समझदि। यां चिट्ठी राजनीतिक संगठन कु नीं च, बल या वीं पीढ़ी कि लिखीं चिट्ठी च जै तैं हम ‘देस कु भवेष्य’ ब्वलदौ। राष्ट्रपति तैं लिखि या चिट्ठी याकु प्रमाण च की जब व्यवस्था स्ये जांद तब वीं स्यीं व्यवस्था तैं जगौंणा वास्ता बच्चों तैं अगनै आण प्वड़दु। या चिट्ठी हमर समाज तैं झक्वळणि हि नी च बल या हमर समाज कु मुण्ड तैं बि निस करण च। जु समाज हरेक दा बेटि मौत पर कुछ दिन हौ हल्ला कैकि चुप ह्वे जांद। उन्न लेखिकि जु छंवी हूंणि छन वा से हम सबि दगड़िया परेसान छौ, अर स्वच्णा छा कि गरीब नौनिकि जिन्दगी इतगा सस्ती च। यां चिट्ठी वीं सरकार पर बि सवाल करणि च, ज्वा बेटी बचाव, कु नारा त खुब लगान्द, पर जब क्वीं बेटी वीआईपी बन्दबस्त समणि खड़ी हूंद त सर्या तंत्र वीआईपी तैं बचौंणम लगि जांद।

बेटी अंकिता तैं निसाब दिलौंणा वास्ता कक्षा दसकी द्वी नौनियों राष्ट्रपति तैं लिखीं या चिट्ठी देसा लोकतांत्रिक बन्दुबस्त पर बि सवाल खड़ा करणि च बल या से बि जादा सरमा बात या च कि अंकिता तैं निसाबा दिलौंणा अवाज इस्कुल्यां नौन्याळु बिटि बि आणि च। सखम सवाल यु नी च कि यु इस्कुल्यां नौनियों राष्ट्रपति तैं चिट्ठी लेखि, यखम सवाल यों च कि ऊतैं चिट्ठी ल्यखणा खुणि कैन मजबूर कायी? या चिट्ठ हमर समाजै मुख पर चटकताळ च। या चिट्ठी बतौंणि च कि हमन बेटियों तैं सुरक्षा नी द्यायी अर ‘संघर्ष’ त हमन बेटी कु भाग च बोलिकि वींतैं पैदा हूंद हि द्यायी। जब अरोपी क्वीं वीआईपी च त सर्या सरकार वै वीआईपी तैं बचौंणा खुणि खड़ी ह्वे जांद। या साबित हूंणू च कि देसम काननू सब्यौं खुणि बराबरा नी च। यां चिट्ठी पुछणि च क्य लोकतंत्रा मा वीआईपी तैं अपराध करणा छूट च? क्य वीआईपी हूंणा मतबल अपराध से बचणा कु लाइसेंस च?

आज कक्षा दसकी नौनि अंकिता तैं निसाब दिलौंणा वास्ता तैं चिट्ठी लय्खणि छन अर सवाल पुछणि च कि जब अंकिता तैं निसाब नी मिललु, त हम हौरि नौनि अप्फु तैं कनुकैकि सुरक्षित समझळा? यु हमर समाज कु नैतिक पतन च प्रमाण च।

या चिट्ठी सरकार से सीधा सवाल पुछणि च की आखिर किलै वीआईपी तैं बचौंणा खुणि सर्या तंत्र खडु ह्वीं च? या चिट्ठी सवाल करणि च की आज देस तैं ‘बेटी बचाओ’ जन्ना ख्वखळा नारा की राजनीति नी चैंणि च। आज देस तैं इन्ना पोस्टर ना, बल आज हमतैं निसाब चैंणु च। यु द्वी बेटियों की एक बेटी अंकिता तैं निसाब दिलौंणा वास्ता ल्यखि चिट्ठी आण वला बगत मा इतिहास बणि जाली। या चिट्ठी तब यीं बातै गवै द्याली कि जब समाज अर सर्या व्यवस्था चुप ह्वे जांद, तब एक बेटी खुणि बेटी न निसाब मांगि छायीं। अब फैसला सरकार तैं लिंण। या त सरकार ईमादारि से यु बेटियों तैं जबाव दे, अर वीआईपी सजा दे।

नथर हम सब्यौं तैं यीं बाति तैं मनण खुणि त्यार ह्वे जांण चैंद कि देसम निसाब पद अर पौंछ देखिकि हूंद। हां अब अगर यीं नौनियों कु भरोसु टुटलु, त सिरफ एक भरोसु हि नी टुटलु, बल लोकतंत्रा भवेष्य पर सवाल खड़ा होला।

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