हिंदी भाषा कु विरोध किलै . . .
आखिर महाराष्ट्र सरकारन प्रदेसम बच्चों तैं जबरदस्ती हिन्दी भाषा पढ़ौंना बारम विपक्ष कु लगयूं आरोपु क बीच तीन भाषा नीति पर जारी आदेश तैं वापिस लियाली। सरकरि आदेश मा हिंदी तैं प्राथमिक इस्कुलों म तिसरी भाषा क तरौं शामिल करेग्ये छायीं। पैलि सरकरि आदेशम कक्षा 1 बिटि 5 तक हिन्दी भाषा तैं तिसरी भाषा सबि तैं पढ़ाणा खुणि जरुरी करेग्ये छायीं। अर दूसर आदेशम हिन्दी भाषा, पढ़णु बच्चों की इच्छा पर छायीं। महाराष्ट्रम सरकरि आदेश बाद शिवसेना यूबीटी अर हौरि राजनैतिक दलु न आंदोलन सुरु कै दे छायीं। उन्न महाराष्ट्रम जबदस्ती हिन्दी लागू करणा कु ठिकरु सरकरा मुण्ड मा फोड़ि अर आदेशा चिट्ठी तैं फुंकि दे।
इन्न मा बड़ सवाल हि यों च कि आखिर हिन्दी भाषा कु विरोध किलै? यांकु जवाब देंणु थ्वड़ा कठिण च। किलैकि संविधानम क्वीं राष्ट्रभाषा नीं च। भारत संविधानम हिन्दी तैं राजभाषा ब्वलें ग्यायी, ‘राष्ट्रीय भाषा’ ना। यांका बाद बि हिन्दी तैं राष्ट्रीय भाषा ब्वलें जाणु व, जै कारण दुसर भाषा का लोग नराज छन। पर यखम हिन्दी भाषा कु विरोध करण वलों पर बि सवाल छन बल तुम तैं हिन्दी पढ़णम नखरि लगणु च, क्वीं बात नी च पर हिंदी भाषा कु विरोध कैकि तुम हिन्दी भाषा ब्वन वला लोगु क भावना तैं ठेस पौंचाणा कु बि काम करणा छा? यखम हमतैं या बात बि समझण प्वाड़लि कि एक जन्नि भाषा हूंण से देसा सबि लोगु बीच संवाद बौत असान ह्वे जांदा, खास कैकि अलग-अलग प्रदसु या क्षेत्रु मा। एक भाषा ‘देस पछ्याण’ बणि सकद। यां से देसा लोग एक जुठ एक मुठ ह्वे जाला त सांस्कृतिक समानता की भावना बढ़ि जाली। एक भाषा से हम सब्यौं कु ज्यूं मा ‘हम भारतीय एक छा’ या भावना बि ऐ जाली। सर्या देसम एक भाषा होलि त हमरि शिक्षा बि सर्या देसम एक जन्नि ह्वे जाली। यां से एक प्रदेस से दूसर प्रदसे जाण वला बच्चों तैं भाषाक कारण क्वीं दिक्कत नीं होलि। प्रशासन, व्यापार, शिक्षा अर हौरि कामु तैं समझण मा बौत असानी ह्वे जांद। एक भाषा से देसा कुणा-कुणौं मा रुजगार असानी से पौछि जालु। सरकरि कर्मचारियों तैं सर्या देसमा काम करणु असान ह्वे जालु। एक भाषा सर्या दुन्या मा हमर देसा पछ्याण बणि जाली।
अबि त हम इतगै हि बोलि सकदो कि हिन्दी भाषा भारत देसा मुण्डा बिन्दी च। अब जरा स्वाचा भैर देस जाणा वास्ता हम अंग्रेजी या वे देसा भाषा बि तैं बि बिन्गदा अर ब्चयांदा छौ, त अपणि देसा भाषा हिन्दी सिखण झिचकणा किलै छौ। उन्नि बि दूसर भाषा सिखण से हमरि पछ्याण खतम नीं हूंदि, बल हमतैं अगनै बढ़णा कु मौका जरुर मिलदू।
भारत जन्न देसा तागत हि बहुलता म च अर इल्लै भारत देसम सबि भाषा कु सम्मान हूंण चैंद न कि विरोध। एक भाषा देस तैं एक करद, अर बौत सर्या भाषा देसा विविधिता अर जसा(समद्धि) पछ्याण च। इल्लै हमतैं भाषा की राजनीतिकरण तैं छोड़िकि अगनै स्वचण चैंद कि हिन्दी भाषा कु विरोध कैकि हम अपणि औंण वलि पीढ़िक् वास्ता भवेष्यम मिलण वला अवसरु का द्वार बि बन्द करणा।
